छोटे से गांव से किसानों की आवाज़ बनीं रीतू सैनी, संघर्ष, ईमानदारी और सेवा की मिसाल

किसानों और मजदूरों की आवाज़ बनकर उभरीं रीतू सैनी

बेहट विधानसभा के गांव ताल्हापुर निवासी रीतू सैनी ने एक साधारण ग्रामीण पृष्ठभूमि से निकलकर किसानों और मजदूरों की आवाज़ को मजबूती से बुलंद किया है। अपने संघर्ष, ईमानदारी और मेहनत के बल पर उन्होंने न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि हरियाणा, उत्तराखंड और अन्य राज्यों में भी अपनी अलग पहचान बनाई है। किसान हितों के लिए सड़क से लेकर प्रशासन तक संघर्ष करना, धरना-प्रदर्शन करना और सरकार के समक्ष किसानों की समस्याओं को मुखरता से रखना उनके जीवन का उद्देश्य बन गया।

नकुड़ विधानसभा के साधारण परिवार से बेहट की बहु बनने तक का सफर

रीतू सैनी का जन्म नकुड़ विधानसभा के ककराली गांव के एक साधारण परिवार में हुआ। विवाह के बाद वह बेहट विधानसभा के गांव ताल्हापुर आईं और वहां की बहु बनीं। एक ग्रामीण बहु के रूप में घर की जिम्मेदारियों के साथ-साथ समाज के लिए बाहर निकलना आसान नहीं था। गांव की परंपराएं, सामाजिक बंदिशें और महिलाओं को लेकर बनी सोच उनके रास्ते की बड़ी चुनौतियां थीं, लेकिन रीतू सैनी ने इन सभी सीमाओं को पार करते हुए किसानों की लड़ाई को अपना मिशन बना लिया।

किसानों की लड़ाई में कदम रखने की हिम्मत

रीतू सैनी बताती हैं कि किसानों की समस्याएं, उनकी पीड़ा और शोषण ने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया। किसानों के हक की लड़ाई के लिए उन्हें कई बार धरनों में बैठना पड़ा, आंदोलनों में हिस्सा लेना पड़ा और शासन-प्रशासन से सीधी टक्कर लेनी पड़ी। कई मौकों पर किसानों को उनके अधिकार दिलाने के लिए प्रशासन से दो-चार होना पड़ा, तो कभी पुलिस की लाठियां भी झेलनी पड़ीं। मुकदमों का सामना करना पड़ा, लेकिन उनका हौसला कभी नहीं डगमगाया।

पति और परिवार का मिला पूरा सहयोग

रीतू सैनी के संघर्ष में उनके ससुराल पक्ष और पति का सहयोग सबसे बड़ी ताकत बना। वह बताती हैं कि उनके पति डॉ. धूम सिंह सैनी ने हर मोड़ पर उनका साथ दिया। समाज की ओर से ताने भी सुनने पड़े कि महिलाएं घर की चारदीवारी तक सीमित रहें और आंदोलनों में हिस्सा न लें। कई लोगों ने कहा कि किसान आंदोलन पुरुषों का काम है, महिलाएं इसमें क्या करेंगी। लेकिन पति और परिवार के समर्थन ने रीतू सैनी के हौसलों को और मजबूत किया और वह लगातार आगे बढ़ती रहीं।

पहला संगठन: किसान यूनियन क्रांति से शुरुआत

किसानों की लड़ाई के लिए रीतू सैनी ने सबसे पहले किसान यूनियन क्रांति संगठन को ज्वाइन किया। यही वह मंच था जहां से उन्हें अपनी असली उड़ान भरने का अवसर मिला। संगठन में उनकी सक्रियता, मेहनत और ईमानदारी को देखते हुए उन्हें प्रदेश अध्यक्ष का दायित्व सौंपा गया। इस पद पर रहते हुए उन्होंने किसानों की समस्याओं को मजबूती से उठाया और आंदोलन को नई दिशा दी।

लालच और सियासत से दूरी, संगठन से अलगाव

हालांकि संगठन में रहते हुए रीतू सैनी ने यह भी देखा कि कुछ लोग किसानों की आड़ में अपने निजी हित साधने में लगे हुए थे। कुछ कार्यकर्ताओं ने रीतू को अपने फायदे के लिए आगे किया, लेकिन रीतू सैनी का उद्देश्य केवल और केवल किसानों की सेवा था। जब उन्होंने देखा कि किसानों की बोली लगाई जा रही है और ईमानदारी से समझौते किए जा रहे हैं, तो उन्होंने किसी भी तरह के लालच को ठुकरा दिया। इन्हीं कारणों से नाराज होकर उन्हें किसान यूनियन क्रांति संगठन छोड़ना पड़ा।

भारतीय किसान यूनियन (WF) में नई जिम्मेदारी

संगठन छोड़ने के बाद भी रीतू सैनी का जज्बा खत्म नहीं हुआ। किसानों की सेवा का संकल्प लेकर उन्होंने भारतीय किसान यूनियन (WF) से जुड़कर नई शुरुआत की। यहां उन्हें महिला प्रकोष्ठ की राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई। इस पद पर रहते हुए उन्होंने पूरी निष्ठा और ईमानदारी से संगठन के लिए काम किया और किसानों की समस्याओं को लगातार उठाती रहीं।

WF से निष्कासन और मन की पीड़ा

हालांकि WF संगठन में भी कुछ घटनाएं ऐसी हुईं जो रीतू सैनी को नागवार गुजरीं। बिना किसी पूर्व सूचना के उन्हें निष्कासन पत्र भेज दिया गया, जिससे उन्हें गहरा आघात पहुंचा। इसके बावजूद उन्होंने किसानों की सेवा के अपने लक्ष्य से कभी समझौता नहीं किया। उनके मन में यही विचार बना रहा कि उनका जीवन मानव सेवा और किसानों की समस्याओं के समाधान के लिए समर्पित रहेगा।

खुद का संगठन बनाने का निर्णय

WF से निष्कासन के बाद कई समर्थकों और साथियों ने रीतू सैनी को अपना खुद का संगठन बनाने की सलाह दी। किसानों के बीच उनकी लोकप्रियता और विश्वास को देखते हुए यह सुझाव मजबूत होता गया। अंततः रीतू सैनी ने भारतीय किसान यूनियन भवानी की स्थापना की और नई ऊर्जा के साथ किसानों की लड़ाई में जुट गईं।

भारतीय किसान यूनियन भवानी के माध्यम से संघर्ष जारी

भारतीय किसान यूनियन भवानी की स्थापना के साथ ही रीतू सैनी ने यह स्पष्ट कर दिया कि उनका उद्देश्य किसी पद या लाभ के लिए नहीं, बल्कि किसानों की वास्तविक समस्याओं को हल करना है। संगठन के माध्यम से वह लगातार किसानों के हक की लड़ाई लड़ रही हैं और ग्रामीण समाज में जागरूकता फैला रही हैं।

संघर्ष, ईमानदारी और सेवा की प्रतीक बनीं रीतू सैनी

रीतू सैनी आज उन महिलाओं के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं, जो समाज की बेड़ियों को तोड़कर कुछ अलग करना चाहती हैं। एक गांव की बहु से लेकर किसान आंदोलन की मजबूत आवाज बनने तक का उनका सफर संघर्ष, धैर्य और निस्वार्थ सेवा का प्रतीक है। किसानों की लड़ाई में उनका योगदान आने वाले समय में भी याद किया जाएगा।


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